Class 7 Hindi Chapter 3 असम का वृन्दावन Solutions | AJB Assam
সপ্তম শ্ৰেণী হিন্দী অধ্যায় ৩ – असम का वृन्दावन সম্পূৰ্ণ পাঠ্যভিত্তিক প্ৰশ্নোত্তৰ আৰু সমাধান (AJB Assam)
সপ্তম শ্ৰেণীৰ হিন্দী (Hindi) পাঠ্যক্ৰমৰ তৃতীয় অধ্যায় ‘असम का वृन्दावन’ অসমৰ সত্ৰীয়া সংস্কৃতি আৰু আধ্যাত্মিক ঐতিহ্যৰ ওপৰত আধাৰিত এটা অতি গুৰুত্বপূৰ্ণ পাঠ। অসম জাতীয় বিদ্যালয়ৰ (AJB) শেহতীয়া নতুন পাঠ্যক্ৰমৰ আধাৰত এই অধ্যায়ৰ সম্পূৰ্ণ পাঠ্যভিত্তিক প্ৰশ্নোত্তৰ (Class 7 Hindi Chapter 3 Textual Question Answer) প্ৰস্তুত কৰা হৈছে। এই বিশেষ সংকলনটিত পাঠভিত্তিক চমু প্ৰশ্ন, দীঘলীয়া প্ৰশ্ন, ব্যাকৰণ, অতিৰিক্ত প্ৰশ্ন (Additional Questions) আৰু বহু-বিকল্পী প্ৰশ্ন (MCQs) অন্তৰ্ভুক্ত কৰা হৈছে। অস্পীন একেডেমী (Ospin Academy) ত এই সমাধানসমূহ অতি সহজ আৰু নিৰ্ভুলভাৱে উপলব্ধ কৰোৱা হৈছে যাতে ছাত্ৰ-ছাত্ৰীসকলে ঘৰতে বহি সুন্দৰভাৱে অনুশীলন কৰিব পাৰে।
‘असम का वृन्दावन’ নামৰ এই পাঠটিত অসমৰ দ্বিতীয় বৈকুণ্ঠ বৰপেটা সত্ৰৰ ঐতিহাসিক মহত্ত্ব, মহাপুৰুষ শ্ৰীমন্ত শংকৰদেৱ আৰু শ্ৰীশ্ৰীমাধৱদেৱৰ অমৰ অৱদান তথা অসমীয়া সংস্কৃতিৰ সুন্দৰ বৰ্ণনা দাঙি ধৰা হৈছে। ছাত্ৰ-ছাত্ৰীসকলৰ বাবে এই পাঠৰ মূল বিষয়বস্তু, শব্দাৰ্থ আৰু তাৎপৰ্য বুজি পোৱাটো অতি প্ৰয়োজনীয়। আমাৰ এই পাঠ্যভিত্তিক সমাধানত কেৱল পাঠ্যপুথিৰ অনুশীলনীৰ প্ৰশ্নসমূহেই নহয়, বৰঞ্চ পৰীক্ষাত আহিব পৰা অতিৰিক্ত গুৰুত্বপূৰ্ণ প্ৰশ্ন-উত্তৰসমূহো সামৰি লোৱা হৈছে।
এই পাঠ্যভিত্তিক সমাধানৰ পৰা আপুনি কি কি শিকিব আৰু পাব:
- অসমৰ বৃন্দাবন স্বৰূপ বৰপেটা সত্ৰৰ মহত্ত্ব আৰু সত্ৰীয়া সংস্কৃতিৰ স্পষ্ট বিশ্লেষণ।
- শব্দাৰ্থ, চমু আৰু দীঘলীয়া প্ৰশ্নৰ পৰীক্ষাত লিখিব পৰা নিৰ্দোষ উত্তৰ।
- পাঠভিত্তিক ব্যাকৰণ, বাক্য ৰচনা, সমাৰ্থক আৰু বিপৰীত শব্দৰ সঠিক জ্ঞান।
- পৰীক্ষাৰ বাবে প্ৰয়োজনীয় অতিৰিক্ত প্ৰশ্ন (Additional Questions) আৰু তাৰ উত্তৰ।
- নতুন আৰ্হি অনুসৰি গুৰুত্বপূৰ্ণ বহু-বিকল্পী প্ৰশ্নৰ (MCQs) সম্পূৰ্ণ সমাধান।
অস্পীন একেডেমীৰ এই প্ৰশ্নোত্তৰসমূহৰ বিশেষ সুবিধা:
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ছাত্ৰ-ছাত্ৰীসকলৰ শৈক্ষিক উত্তৰণৰ প্ৰতি লক্ষ্য ৰাখি অস্পীন একেডেমীয়ে এই বিশেষ পাঠ্যভিত্তিক সমাধান আগবঢ়াইছে। আপোনাৰ পৰীক্ষাৰ প্ৰস্তুতি এতিয়াই আৰম্ভ কৰক আৰু হিন্দী বিষয়ত সৰ্বোচ্চ নম্বৰ লাভ কৰাৰ দিশত আগবাঢ়ক।
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AJB Class 7: Hindi
असम का वृन्दावन
Texual Solutions
अभ्यास-माला
1. निम्नलिखित प्रश्नों के संक्षिप्त उत्तर दो :
i) बरपेटा सत्र का निर्माण किसने किया था ?
उत्तरः बरपेटा सत्र की स्थापना महापुरुष श्री माधवदेव द्वारा की गई थी।
ii) माधवदेव बरपेटा सत्र को किसके समान पवित्र मानते थे?
उत्तरः श्री माधवदेव बरपेटा सत्र को ‘मथुरा’ तथा ‘वृंदावन’ की तरह ही अत्यंत पावन और पवित्र मानते थे।
iii) ‘कीर्तन घर’ का निर्माण पाँचवी बार के लिए कब किया गया था ?
उत्तरः ‘कीर्तन घर’ को पाँचवीं बार वर्ष 1952 ईसवी में निर्मित किया गया था।
iv) बरपेटा-सत्र के प्रवेश-द्वार कितने हैं?
उत्तरः बरपेटा-सत्र के भीतर प्रवेश करने के लिए कुल तीन द्वार बनाए गए हैं।
v) शंकरदेव के जन्मोत्सव पर यहाँ किन नाटकों को प्रदर्शित किया जाता है?
उत्तरः श्रीमंत शंकरदेव की जयंती के शुभ अवसर पर यहाँ ‘कालीय दमन’ तथा ‘राम विजय’ नाटकों का मंचन किया जाता है।
vi) भवानीपुर सत्र का निर्माण किसने किया था ?
उत्तरः भवानीपुर-सत्र की स्थापना ‘गोपाल आता’ के द्वारा की गई थी।
2. पढ़ो, समझो और लिखो :
उदाहरण : पाटवाउसी बरपेटा। शंकरदेव
|
सत्र |
स्थान |
निमर्माता |
|
जनीया सत्र |
………… |
………… |
|
आउनीआटी सत्र |
………… |
………… |
|
गड़मूर सत्र |
………… |
………… |
|
भवानीपुर सत्र |
………… |
………… |
|
सुन्दरीदिया सत्र |
………… |
………… |
उत्तरः
|
सत्र |
स्थान |
निर्माता |
|
जनीया सत्र |
बरपेटा |
नारायणदा,सठाकुर आटा |
|
आउनीआटी सत्र |
माजुली |
निरंजन देव |
|
गड़मूर सत्र |
माजुली |
जयहरि देव |
|
भवानीपुर सत्र |
पाठशाला |
गोपालदेव आता |
|
सुन्दरीदिया सत्र |
बरपेटा |
माधवदेव |
3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दो :
i) शंकरदेव और माधवदेव द्वारा बरपेटा में स्थापित चार-चार सत्रों के नाम लिखो।
उत्तरः
|
शंकदेव |
माधवदेव |
|
बरपेटा सत्र गणककुछि सत्र सुन्दरीदिया सत्र, कापला सत्र |
ii) राजेन्द्र क्या सोच रहा था ?
उत्तरः राजेन्द्र पुराने ‘कीर्तन घर’ के विषय में विचार कर रहा था।
iii) बरपेटा के ‘कीर्तन घर’ में कितने ‘गुरु आसन’ है ? वहाँ क्या-क्या रखे हुए हैं?
उत्तरः बरपेटा स्थित ‘कीर्तन घर’ के भीतर तीन ‘गुरु आसन’ मौजूद हैं। इसकी ‘स्थापना’ पर श्री शंकरदेव तथा श्री माधवदेव द्वारा रचित धर्मग्रंथ रखे गए हैं। ‘गुरु आसन’ के सामने बारह दीप प्रज्वलित किए जाते हैं।
iv) गुरु आसन के सम्मुख कितने दीये जलाये जाते हैं और क्यों ?
उत्तरः ‘गुरु आसन’ के आगे कुल बारह दीपक प्रज्वलित किए जाते हैं। ये बारह दीप बारह महान आतापुरुषों की स्मृति में रोशन किए जाते हैं। इनमें से तीन दीपक ऐसे हैं जो दिन-रात अखंड रूप से प्रज्वलित रहते हैं।
v) बरपेटा को सत्रों की मिलनभूमि क्यों कहा जाता है ?
उत्तर : बरपेटा को सत्रों की मिलनभूमि के रूप में जाना जाता है। इसका कारण यह है कि सत्राधिकार लोग सत्रों की स्थापना के जरिये जनमानस को धर्म एवं न्याय की ओर आकृष्ट करना चाहते थे। वे लोगों के मन से भेदभाव को दूर करके आपसी एकता को बढ़ावा देना चाहते थे। कई महान संतों ने बरपेटा में सत्रों की स्थापना की थी। महापुरुष माधवदेव की दृष्टि में ‘बरपेटा सत्र’ बिल्कुल ‘मथुरापुरी’ और ‘वृंदावन’ के समान ही पावन था।
4. बरपेटा के ‘कीर्तन घर’ के सम्बन्ध में एक लेख लिखो।
उत्तरः बरपेटा स्थित ‘कीर्तन घर’ का निर्माण सर्वप्रथम महापुरुष माधवदेव जी ने सन् 1583 ईसवी में उत्तर-दक्षिण दिशा की ओर किया था। ठीक दो साल पश्चात् उनकी ही इच्छा से इसे पूर्व-पश्चिम दिशा में निर्मित किया गया। सन् 1595 ईसवी में अग्निकांड के कारण यह भस्म हो गया, तब माधवदेव जी के निर्देश पर उनके प्रमुख शिष्य मथुरादास ने ‘कीर्तन घर’ का दोबारा निर्माण करवाया। तत्पश्चात उन्नीसवीं शताब्दी में मान आक्रमणकारियों ने आकर इसे फिर से अग्नि के हवाले कर दिया। तब स्थानीय श्रद्धालुओं ने अथक परिश्रम करके चौथी बार इसका पुनर्निर्माण किया। कालान्तर में भूकंप के कारण इसे दोबारा नुकसान पहुँचा। इस बार भी स्थानीय भक्तों ने ही इसे पुनः बनवाया। पुराने ‘कीर्तन घर’ में लगे सरल वृक्ष के विशाल स्तंभों के स्थान पर वर्तमान में दो तुलसी वृक्ष के विशाल स्तंभ स्थापित कर दिए गए हैं। ‘कीर्तन घर’ के भीतर तीन ‘गुरु आसन’ विद्यमान हैं। इनकी ‘स्थापना’ पर श्री शंकरदेव तथा श्री माधवदेव द्वारा रचित धर्मग्रंथ रखे गए हैं। ‘गुरु आसन’ के आगे बारह दीप प्रज्वलित किए जाते हैं। ये बारह दीपक बारह महान आतापुरुषों की स्मृति में रोशन किए जाते हैं। इनमें से तीन दीपक अखंड रूप से दिन-रात जलते रहते हैं।
5. चचर्चा करो :
बरपेटा सत्र की तरह माजुली में स्थित सत्रों के बारे में चचर्चा करो।
उत्तरः विद्यार्थीगण अपने अध्यापक की सहायता से इस कार्य को स्वयं पूरा करें।
6. सत्रों के माध्यम से शंकरदेव माधवदेव ने सिर्फ बैष्णव धर्मका ही प्रचार नहीं किया, अपितु असमीया समाज-व्यवस्था का भी संगठन किया। इस मत से तुम कहाँ तक सहमत हो ?
उत्तरः जिस कालखंड में महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव एवं श्री माधवदेव का अवतरण हुआ था, उस दौर में असम का समाज पूरी तरह से खंडित हो चुका था। लोगों के बीच आपसी भाईचारे की बहुत कमी थी। हर कोई एक-दूसरे का दुश्मन बना हुआ था। इन महापुरुषों ने अवतरित होकर उस दुश्मनी और द्वेष की भावना को समाप्त किया तथा एक निर्मल एवं मजबूत समाज की नींव रखी। उन्होंने समाज से जातिवाद और छुआछूत जैसी कुरीतियों को दूर करके सबको एकता के सूत्र में पिरोने का प्रयास किया। इसी उद्देश्य से सत्रों की स्थापना की गई और वहाँ समाज के हर वर्ग को आमंत्रित किया गया। सत्रों के जरिए ही इन महापुरुषों ने एक सुव्यवस्थित और स्थिर असमिया समाज को गढ़ा। अतः मैं इस विचार से पूरी तरह से सहमत हूँ।
7. निम्नलिखित शब्दों के अर्थ पार्थकॅ लिखो (इसे भिन्नार्थक शब्द भी कहते हैं) पानी
पाणि
बलि
बली
कुल
कूल
दिन
कलि
कली
सर्ग
स्वर्ग
उत्तर : पानी – जल।
पाणि – हाथ।
बलि – बलिदान।
बली – बलबान।
कुल – संपूर्ण।
कूल – वंश।
दिन – दिवस।
दीन – गरीब।
कलि – कलियुग।
कली – अर्धखिला फूल।
सर्ग – अध्याय।
स्वर्ग – देवलोक।
8. पढ़ो और समझो :
गंगा- एक पवित्र नदी है। (गंगा- स्त्रीलिंग)
ब्रह्मपुत्र- एक बहुत विशाल नद है। (ब्रह्मपुत्र- पुल्लिंग)
इस तरह के ढेरों निर्जीव संज्ञा शब्दों के लिंग की पहचान करने हेतु हमें कुछ खास नियमों का सहारा लेना पड़ता है। उदाहरणस्वरूप-
i) शरीर के अवयव (अंग)- हाथ, दाँत, कान, मुँह, बाल, सिर इत्यादि पुल्लिंग होते हैं। परंतु- आँख, जीभ, छाती, हड्डी, कमर इत्यादि स्त्रीलिंग के अंतर्गत आते हैं।
ii) मुल्क, पहाड़, पर्वत, जगह आदि के नाम पुल्लिंग माने जाते हैं। जैसे- भारतवर्ष, जापान, नीलाचल, हिमालय, विंध्य, कानपुर, तेजपुर, गुवाहाटी इत्यादि।
iii) नदियों के नाम स्त्रीलिंग होते हैं। जैसे- गंगा, यमुना, सरस्वती, कावेरी, गोदावरी, झेलम इत्यादि। लेकिन ब्रह्मपुत्र, सोन और सिंधु पुल्लिंग हैं।
iv) ई, नी, आनी, आई, इया, इमा, त, ता, आस, री, आवट, आहट, हट, वट इत्यादि प्रत्ययों से अंत होने वाले शब्द स्त्रीलिंग होते हैं। उदाहरण- सर्दी, चटनी, लड़ाई, देवरानी, चिड़िया, लालिमा, चाहत, सुंदरता, मिठास, चाकरी, लिखावट, घबराहट, मिलावट आदि।
9. भाव-पल्लवन करो :
i) घर की मुर्गी दाल बराबर।
उत्तरः यह एक प्रसिद्ध लोकोक्ति है, लोकोक्ति का तात्पर्य जनमानस में मशहूर उक्ति (कहावत) से है। इस वाक्य का अभिप्राय है अपनी सुलभ या पास की वस्तु का महत्व न समझना। रमेश के पास एक बेहतरीन नौकरी है, फिर भी वह अन्य नौकरी की तलाश में दर-दर भटक रहा है। इसके लिए बिलकुल सही कहा गया है- ‘घर की मुर्गी दाल बराबर’।
ii) मन के जीते जीत है, मन के हारे हार।
उत्तरः यह भी एक कहावत या लोकोक्ति है, लोकोक्ति से आशय लोक में प्रचलित कथन से होता है। इसका भावार्थ यह है कि मनुष्य की जीत और हार पूरी तरह उसकी मानसिक स्थिति (मन) पर निर्भर करती है। श्याम पढ़ाई में एक होनहार छात्र है, यदि वह मन लगाकर पढ़े तो कक्षा में अव्वल आ सकता है। लेकिन वह परीक्षा के नाम से ही घबरा जाता है। सच ही कहा गया है- ‘मन के जीते जीत है, मन के हारे हार’।
10. बारह आता कौन-कौन हैं? उनका नाम लिखो।
उत्तरः बारह आता पुरुषों के नाम इस प्रकार हैं: (i) मथुरादास बुढ़ा आता, (ii) पद्म आता, (iii) वरविष्णु आता, (iv) नारायणदास ठाकुर आता, (v) केशवचरण आता, (vi) श्रीराम आता, (vii) बेहेरिया विष्णु आता, (viii) राम आता, (ix) भवानीपुरिया गोपाल आता, (x) हरिहर आता, (xi) मोहदानन्द आता, (xii) सहजानन्द आता।
11. वृन्दावनी वस्त्र क्या है? उत्तर दो।
उत्तरः महाराज नरनारायण ने महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव से यह आग्रह किया था कि वे एक कपड़े पर ‘भगवान श्रीकृष्ण के जन्म से लेकर कंस वध’ तक की संपूर्ण लीलाओं को उकेरें। नरेश का आदेश स्वीकार करके वे शाही खजाने से जरूरत की सारी सामग्री लेकर बरपेटा आ गए। ऐसा माना जाता है कि वर्तमान कीर्तन घर वाली जगह पर ही जुलाहे मथुरादास बूढ़ा आता और अन्य बुनकरों की मदद से शंकरदेव जी ने इस वस्त्र का निर्माण किया था। इस वस्त्र पर मथुरा और वृंदावन से जुड़ी कृष्ण की बाल लीलाओं की सभी घटनाओं को दर्शाया गया था। इसी कारण इसका नाम ‘वृंदावनी वस्त्र’ रखा गया था। कुल तेरह हिस्सों में बँटे इस वस्त्र को तैयार करने में करीब एक साल का वक्त लगा था। इस कपड़े की लंबाई 120 हाथ तथा चौड़ाई 60 हाथ की थी। महाराज नरनारायण ने इसे बेहद सुरक्षा के साथ रखा था। परंतु बाद में अंग्रेज लोग इसे अपने साथ ले गए और लंदन के ‘ब्रिटिश म्यूजियम’ में सुरक्षित रख दिया। ऐसा सुनने में आया है कि वर्तमान में हमारी भारत सरकार इसे स्वदेश वापस लाने का प्रयास कर रही है।




