Class 7 Hindi Chapter 11 – प्रतिशोध – All Textual Solutions | AJB Assam

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Class 7 Hindi Chapter 11 प्रतिशोध Solutions | AJB Assam

সপ্তম শ্ৰেণী হিন্দী অধ্যায় ১১ – प्रतिशोध (Pratishodh) সম্পূৰ্ণ পাঠ্যভিত্তিক প্ৰশ্নোত্তৰ আৰু সমাধান (AJB Assam)

সপ্তম শ্ৰেণীৰ হিন্দী (Hindi) পাঠ্যক্ৰমৰ একাদশ অধ্যায় ‘प्रतिशोध’ এখন অতি গুৰুত্বপূৰ্ণ আৰু শিক্ষাপ্ৰদ পাঠ। অসম জাতীয় বিদ্যালয়ৰ (AJB) শেহতীয়া নতুন পাঠ্যক্ৰমৰ আধাৰত এই অধ্যায়ৰ সম্পূৰ্ণ পাঠ্যভিত্তিক প্ৰশ্নোত্তৰ (Class 7 Hindi Chapter 11 Textual Question Answer) প্ৰস্তুত কৰা হৈছে। এই বিশেষ সংকলনটিত পাঠভিত্তিক চমু প্ৰশ্ন, দীঘলীয়া প্ৰশ্ন, ব্যাকৰণ, অতিৰিক্ত প্ৰশ্ন (Additional Questions) আৰু বহু-বিকল্পী প্ৰশ্ন (MCQs) অন্তৰ্ভুক্ত কৰা হৈছে। অস্পীন একেডেমী (Ospin Academy) ত এই সমাধানসমূহ অতি সহজ আৰু নিৰ্ভুলভাৱে উপলব্ধ কৰোৱা হৈছে যাতে ছাত্ৰ-ছাত্ৰীসকলে ঘৰতে বহি সুন্দৰভাৱে অনুশীলন কৰিব পাৰে।

‘प्रतिशोध’ নামৰ এই পাঠটিত মানৱীয় প্ৰমূল্যবোধ, ক্ষমা, সহনশীলতা আৰু প্ৰতিশোধৰ মনোভাৱে কেনেদৰে জীৱনত প্ৰভাৱ পেলায় তাৰ এক তাৎপৰ্যপূৰ্ণ কাহিনী দাঙি ধৰা হৈছে। ছাত্ৰ-ছাত্ৰীসকলৰ বাবে এই পাঠৰ মূল বিষয়বস্তু, শব্দাৰ্থ আৰু তাৎপৰ্য বুজি পোৱাটো অতি প্ৰয়োজনীয়। আমাৰ এই পাঠ্যভিত্তিক সমাধানত কেৱল পাঠ্যপুথিৰ অনুশীলনীৰ প্ৰশ্নসমূহেই নহয়, বৰঞ্চ পৰীক্ষাত আহিব পৰা অতিৰিক্ত গুৰুত্বপূৰ্ণ প্ৰশ্ন-উত্তৰসমূহো সামৰি লোৱা হৈছে।

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এই পাঠ্যভিত্তিক সমাধানৰ পৰা আপুনি কি কি শিকিব আৰু পাব:

  • পাঠটিৰ মূল বিষয়বস্তু, নৈতিক বাৰ্তা আৰু চৰিত্ৰসমূহৰ স্পষ্ট বিশ্লেষণ।
  • শব্দাৰ্থ, চমু আৰু দীঘলীয়া প্ৰশ্নৰ পৰীক্ষাত লিখিব পৰা নিৰ্দোষ উত্তৰ।
  • পাঠভিত্তিক ব্যাকৰণ, বাক্য ৰচনা, সমাৰ্থক আৰু বিপৰীত শব্দৰ সঠিক জ্ঞান।
  • পৰীক্ষাৰ বাবে প্ৰয়োজনীয় অতিৰিক্ত প্ৰশ্ন (Additional Questions) আৰু তাৰ উত্তৰ।
  • নতুন আৰ্হি অনুসৰি গুৰুত্বপূৰ্ণ বহু-বিকল্পী প্ৰশ্নৰ (MCQs) সম্পূৰ্ণ সমাধান।

অস্পীন একেডেমীৰ এই প্ৰশ্নোত্তৰসমূহৰ বিশেষ সুবিধা:

  • শেহতীয়া AJB নতুন পাঠ্যক্ৰমৰ আধাৰত প্ৰস্তুত কৰা সম্পূৰ্ণ পাঠ্যভিত্তিক সমাধান।
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ছাত্ৰ-ছাত্ৰীসকলৰ শৈক্ষিক উত্তৰণৰ প্ৰতি লক্ষ্য ৰাখি অস্পীন একেডেমীয়ে এই বিশেষ পাঠ্যভিত্তিক সমাধান আগবঢ়াইছে। আপোনাৰ পৰীক্ষাৰ প্ৰস্তুতি এতিয়াই আৰম্ভ কৰক আৰু হিন্দী বিষয়ত সৰ্বোচ্চ নম্বৰ লাভ কৰাৰ দিশত আগবাঢ়ক।

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Chapter 11 प्रतिशोध

 AJB Class 7: Hindi

Lesson-11                                                  Ospin Academy

प्रतिशोध

Texual Solutions

1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दो (सम्पूर्ण वाक्य में)

i) मित्रता का निर्वाह कैसे होता है?

उत्तरः मित्रता का निर्वाह सदैव समानता और अहंकारहीनता की भावना के माध्यम से ही होता है।

ii) दो ब्रह्मचारी कौन-कौन हैं?

उत्तरः दो ब्रह्मचारियों में एक पांचाल के राजकुमार द्रुपद और दूसरे भिक्षा पर आश्रित रहने वाले ब्राह्मण पुत्र द्रोण हैं।

iii) गुरुदेव ने अपने शिष्यों को कौन-सा सूत्रोपदेश दिया ?

उत्तरः गुरुदेव ने अपने शिष्यों को ‘सत्यंवद, धर्मचर’ का मूलमंत्र या सूत्रोपदेश प्रदान किया।

iv) अश्वत्थामा कौन था?

उत्तरः अश्वत्थामा गुरु द्रोणाचार्य का पुत्र था।

v) द्रोण एक गाय के लिए किसके पास गये थे ?

उत्तरः एक गाय प्राप्त करने की इच्छा से द्रोण अपने परम मित्र राजा द्रुपद के पास गए थे।

vi) किससे मिलने हेतु द्रोण हस्तिनापुर चले गये ?

उत्तरः द्रोण अपनी बहन कृपी के साथ भेंट करने के उद्देश्य से हस्तिनापुर की ओर चले गए।

vii) हस्तिनापुर में द्रोणाचार्य किससे मिले थे ?

उत्तरः हस्तिनापुर पहुँचने के बाद द्रोणाचार्य की मुलाकात पितामह भीष्म से हुई थी।

viii) एकदिन बालक अश्वस्थामा को माँ ने दूध के नाम पर क्या पिलाकर बहलाया था ?

उत्तरः एक दिन माता ने छोटे बालक अश्वत्थामा को दूध बताकर चावल का सफेद घोल पिलाकर फुसला दिया था।

ix) द्रोणाचार्य ने गुरुदक्षिणा में शिष्यों से क्या माँग की ?

उत्तरः द्रोणाचार्य ने अपने शिष्यों से गुरुदक्षिणा के रूप में पांचाल के घमंडी राजा द्रुपद को बंदी बनाकर प्रस्तुत करने की माँग रखी।

2. उत्तर दो: (30 से 50 शब्दों में)

i) शिक्षा समापन समारोह के अवसर पर गुरु ने अपने शिष्यों से क्या कहा था ?

उत्तरः विद्याध्ययन पूर्ण होने के समारोह में गुरु ने शिष्यों को ‘सत्यंवद, धर्मचर’ का महत्वपूर्ण उपदेश दिया। उन्होंने समझाया कि भगवान पर विश्वास रखते हुए जनकल्याण के कार्यों में लगे रहना ही सज्जन व्यक्ति का मुख्य दायित्व है। इसी विचार के साथ सभी के उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना करते हुए गुरुदेव ने अपना भाषण समाप्त किया।

ii) द्रुपद और द्रोणाचार्य कौन थे ?

उत्तरः द्रुपद पांचाल राज्य के एक होनहार राजकुमार थे, जो राजसी सुख-सुविधाओं के प्रभाव में आकर घमंडी बन चुके थे। दूसरी ओर, द्रोणाचार्य एक भिक्षा पर निर्भर रहने वाले ब्राह्मण के पुत्र थे, जो विद्या के सच्चे उपासक और माँ सरस्वती के परम भक्त थे।

iii) किस घटना को देखने पर द्रोणाचार्य के धैर्य का बाँध टूट गया ?

उत्तरः एक दिन रोते हुए छोटे अश्वत्थामा को शांत करने के लिए उसकी माँ दूध के धोखे में उसे चावल का घोल पिलाकर फुसला रही थी। इस हृदयविदारक दृश्य को देखकर द्रोणाचार्य के सब्र का बाँध टूट गया।

iv) राजसभा में राजा द्रुपद से एक गाय की माँग करने पर द्रोण को क्या उत्तर मिला?

उत्तरः राजदरबार में जब द्रोण ने एक गाय माँगी, तो घमंड में चूर राजा द्रुपद ने उन्हें चेतावनी देते हुए जवाब दिया कि हे द्रोण! क्या तुम्हें यह भी नहीं पता कि दोस्ती हमेशा बराबरी वालों के बीच होती है। एक भिखारी और एक राजा के बीच मित्रता कैसे संभव है।

v) बंदी द्रुपद से द्रोण ने क्या कहा ?

उत्तरः बंदी बने हुए द्रुपद के सामने गर्व से सिर उठाकर गुरु द्रोण ने गंभीर स्वर में कहा, ‘द्रुपद, तुम्हें याद होगा कि तुमने कभी कहा था कि दोस्ती समान हैसियत वालों में होती है। आज तुम्हारे संपूर्ण राज्य पर मेरा कब्जा है। मैं तुम्हें तुम्हारे राज्य का आधा हिस्सा लौटा रहा हूँ, ताकि तुम मेरे बराबर का दर्जा प्राप्त कर सको और मेरी मित्रता के लायक बन सको।’

vi) ‘पारखी नेत्रों ने देख लिया’ का मतलब क्या है? वे पारखी नेत्र किनके हैं?

उत्तरः ‘पारखी नेत्र’ से तात्पर्य किसी व्यक्ति की योग्यता या काम को गहराई से परखने की क्षमता से है, अर्थात् एक गुणी व्यक्ति ही दूसरे गुणी को पहचान सकता है। कुएँ से राजकुमारों की गेंद बाहर निकालने की कला देखकर द्रोणाचार्य की छिपी हुई प्रतिभा उजागर हो गई थी। ये पारखी आँखें पितामह भीष्म की थीं, जिन्होंने यह भाँप लिया था कि राजकुमारों को शस्त्र-विद्या सिखाने के लिए जिस योग्य गुरु की आवश्यकता थी, वह कमी श्रेष्ठ धनुर्धर द्रोणाचार्य पूरी कर सकते हैं।

3. किसने, किससे कहा :

i) ‘पांचाल नरेश अहंकारी द्रुपद को बंदी बनाकर मेरे सामने लाओ, यही मेरे लिए तुम्हारी गुरु-दक्षिणा होगी।’

उत्तरः यह कथन गुरु द्रोणाचार्य ने हस्तिनापुर के राजकुमारों (अपने शिष्यों) से गुरुदक्षिणा माँगते हुए कहा था कि ‘घमंडी पांचाल राजा द्रुपद को बंदी बनाकर मेरे सम्मुख प्रस्तुत करो, यही तुम्हारी ओर से मेरी गुरु-दक्षिणा होगी।’

ii) ‘देव, हमारी गेंद उस कुँए में गिर गई। अब हम क्या करें’ ?

उत्तरः हस्तिनापुर के राजकुमारों ने द्रोणाचार्य द्वारा उनकी परेशानी का कारण पूछे जाने पर उनसे कहा था, ‘हे देव, हमारी गेंद इस कुएँ के अंदर गिर गई है। अब हम लोग क्या करें?’

iii) ‘सावधान द्रोण ! क्या तुम्हें इतना भी ज्ञान नहीं कि मित्रता समान स्तर के व्यक्तियों में ही होती है। एक राजा की रंक के साथ कैसी मैत्री ?’

उत्तरः पांचाल के राजा द्रुपद ने क्रोधित होकर भौंहें सिकोड़ते हुए द्रोण से कहा था- ‘सावधान द्रोण! क्या तुम इतनी सी बात भी नहीं जानते कि दोस्ती हमेशा बराबरी वालों में ही होती है। भला एक राजा की किसी निर्धन से कैसी मित्रता?’

4. ‘क’ अंश के साथ ‘ख’ अंश को मिलाओ :

‘क’ अंश

‘ख’ अंश

द्रोणाचार्य

कौरव-पांडवों के पितामह

द्रुपद

द्रोणाचार्य का पुत्र

भीष्म

तृतीय पांडव

अश्वत्थामा

कौरवों और पांडवों के गुरु

अर्जुन

पांचाल के राजा

उत्तरः

‘क’ अंश

‘ख’ अंश

द्रोणाचार्य

कौरवों और पांडवों के गुरु

द्रुपद

पांचाल के राजा

भीष्म

कौरव-पांडवों के पितामह

अश्वत्थामा

द्रोणाचार्य का पुत्र

अर्जुन

तृतीय पांडव

5. आशय स्पष्ट करो :

i) एक वैभव और ऐश्वर्य का स्वामी और दूसरा विद्या का अकिंचन साधक।

उत्तरः इस पंक्ति में भिन्न स्वभाव वाले दो मित्रों का वर्णन किया गया है। आश्रम में दोनों मित्र एक-दूसरे के साथ इस प्रकार घुले-मिले थे कि उन्हें अपने बाहरी जीवन का ध्यान ही नहीं रहा। इनमें से एक भविष्य का राजा था और दूसरा एक गरीब बालक, जिनका सामान्य परिस्थितियों में मित्र बनना संभव नहीं था।

ii) ईश्वर में आस्था रखते हुए लोक हित में संलग्न रहना ही सभ्यजन का कर्तव्य हैं।

उत्तरः गुरुदेव ने अपने मूल उपदेश ‘सत्यंवद, धर्मचर’ के माध्यम से शिष्यों को यह शिक्षा दी कि परमात्मा में विश्वास रखने के साथ-साथ जन-कल्याण के कार्यों में लगे रहना ही सच्ची इंसानियत और सज्जन व्यक्ति का परम धर्म है।

 6. टिप्पनी लिखो :

 पितामह भीष्म, द्रोणाचार्य, द्रुपद

उत्तरः

पितामह भीष्म : हस्तिनापुर के नरेश शांतनु ने देवी गंगा के साथ विवाह किया था। परंतु गंगा ने विवाह से पूर्व यह शर्त रखी थी कि शांतनु उनके किसी भी कार्य में रोक-टोक नहीं करेंगे। शांतनु ने यह बात स्वीकार कर ली और दोनों का विवाह संपन्न हो गया। कुछ समय पश्चात गंगा ने एक पुत्र को जन्म दिया, लेकिन उसे नदी की धारा में बहा दिया। शांतनु विवश होकर मौन रहे। इसी प्रकार गंगा ने एक-एक करके अपने सात पुत्रों को जल में प्रवाहित कर दिया। जब आठवें पुत्र का जन्म हुआ और गंगा उसे भी नदी में बहाने के लिए ले जाने लगी, तब शांतनु से नहीं रहा गया और उन्होंने गंगा को रोक दिया। शर्त टूटने के कारण गंगा शांतनु को छोड़कर चली गईं, परंतु जाते समय पुत्र देवव्रत को अपने साथ ले गईं और वचन दिया कि योग्य होने पर वे उसे लौटा देंगी। उचित समय आने पर गंगा ने देवव्रत को शांतनु को सौंप दिया। इसी देवव्रत ने जीवन भर ब्रह्मचारी रहने की कठोर प्रतिज्ञा की थी, जिसके कारण वे ‘भीष्म’ के नाम से विख्यात हुए। यही भीष्म आगे चलकर कौरवों तथा पांडवों के पितामह कहलाए।

द्रोणाचार्य : द्रोणाचार्य एक निर्धन ब्राह्मण के पुत्र थे और उनका भरण-पोषण भिक्षाटन से होता था। उन्होंने आश्रम में गुरु से विभिन्न अस्त्र-शस्त्र चलाने की विद्या ग्रहण की थी, जिनमें वे विशेष रूप से धनुर्विद्या में अत्यंत निपुण थे। उन्हें युद्ध में हराना लगभग नामुमकिन था। एक बार जब उनके बचपन के मित्र द्रुपद ने उनका अपमान किया, तो वे अपनी बहन कृपी से मिलने हस्तिनापुर आ गए। कृपी का विवाह कृपाचार्य से हुआ था, जो पहले से ही हस्तिनापुर में आचार्य पद पर कार्यरत थे। एक दिन हस्तिनापुर के राजकुमारों की गेंद खेलते समय कुएँ में गिर गई। सभी इस बात को लेकर परेशान थे कि गेंद को कैसे बाहर निकाला जाए। द्रोणाचार्य यह सब देख रहे थे। उन्होंने राजकुमारों के पास जाकर उनकी परेशानी का कारण पूछा। बच्चों ने बताया, “हे देव, हमारी गेंद कुएँ में गिर गई है, अब हम क्या करें?” बच्चों की यह भोली बात सुनकर द्रोणाचार्य ने अपनी बाण-विद्या की कुशलता से वह गेंद कुएँ से निकाल दी। यह पूरा दृश्य पितामह भीष्म भी देख रहे थे और बालकों ने भी आश्चर्यचकित होकर उन्हें सारी बात बता दी। भीष्म की पारखी नज़रों ने तुरंत पहचान लिया कि यह कोई साधारण व्यक्ति नहीं है। अतः उन्होंने राजकुमारों को शस्त्र-विद्या सिखाने का दायित्व धनुर्विद्या के महान ज्ञाता द्रोणाचार्य को सौंप दिया। इससे जहाँ भीष्म निश्चिंत हो गए, वहीं गुरु द्रोण की पारिवारिक आजीविका की समस्या भी हल हो गई।

द्रुपद : द्रुपद पांचाल देश के राजा पृषत के पुत्र थे, जिनका वास्तविक नाम सत्यजीत था। गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण करते समय उनकी द्रोण के साथ गहरी मित्रता हो गई थी। शिक्षा पूरी होने के बाद जब द्रुपद अपने राज्य वापस लौटे, तो उन्हें युवराज बना दिया गया। राजसी सुख और ऐश्वर्य के नशे में चूर होकर राजकुमार द्रुपद अपने मित्र द्रोण को भूलने लगे और समय के साथ उनकी यादें पूरी तरह मिट गईं। दूसरी ओर, द्रोण ने धनुर्विद्या में तो महारत हासिल कर ली थी, लेकिन वे अपने परिवार के पालन-पोषण के लिए संघर्ष कर रहे थे। वे अपने पुत्र अश्वत्थामा को दूध पिलाने में भी असमर्थ थे, जिससे उन्हें बहुत दुःख होता था। तब उन्हें द्रुपद का वह वचन याद आया कि आवश्यकता पड़ने पर अपने मित्र के पास आना। यह सोचकर द्रोण एक गाय माँगने के लिए पांचाल नरेश द्रुपद के दरबार में पहुँचे। परंतु सिंहासन पर बैठे अभिमानी राजा द्रुपद ने उन्हें पहचानने से ही मना कर दिया और कहा कि एक भिखारी की राजा से कैसी दोस्ती? द्रुपद की बातों में गहरा घमंड झलक रहा था। इससे द्रोण के स्वाभिमान को ठेस पहुँची और वे तुरंत वहाँ से लौट आए। बाद में हस्तिनापुर पहुँचकर उन्होंने पितामह भीष्म के निवेदन पर राजकुमारों को अस्त्र-विद्या सिखाने का कार्यभार सँभाल लिया। जब राजकुमारों की शिक्षा पूर्ण हो गई, तब गुरु-दक्षिणा का समय आया। द्रोणाचार्य ने गुरु-दक्षिणा के रूप में शिष्यों से कहा, “अहंकारी पांचाल राजा द्रुपद को बंदी बनाकर मेरे सामने उपस्थित करो, यही तुम्हारी गुरु-दक्षिणा होगी।” कुरु राजकुमारों ने पांचाल पर आक्रमण कर द्रुपद को बंदी बना लिया। आचार्य द्रोण के सम्मुख द्रुपद सिर झुकाए खड़े थे। तब द्रोण ने गर्व से कहा, “द्रुपद, तुम्हें अपना वह कथन याद होगा कि मित्रता बराबरी वालों में होती है। आज तुम्हारे संपूर्ण राज्य पर मेरा कब्ज़ा है। मैं तुम्हें तुम्हारे राज्य का आधा हिस्सा दे रहा हूँ, ताकि तुम मेरे बराबर का दर्जा प्राप्त कर सको और मेरी मित्रता के लायक बन सको।”

7. भाषा-अध्ययन :

पाठ से चुनकर इनके विपरीतार्थक शब्द लिखोः

समानता, शान्ति, मूर्ख, अयोग्य, दुर्भाग्य, दास, शत्रु, समर्थ, अनुपस्थित, राजा।

उत्तरः

समानता – असमानता

शान्ति – अशान्ति

मूर्ख – विद्वान (या विशारद)

अयोग्य – योग्य

दुर्भाग्य – सौभाग्य

दास – स्वामी

शत्रु – मित्र

समर्थ – असमर्थ

अनुपस्थित – उपस्थित

राजा – रंक

8. निम्नलिखित अभिव्यक्ति का वाक्य में प्रयोग करो :

लज्जा से, चारों ओर, मित्रता की मर्यादा, कोलाहल से, वैभव की चकाचौंध।

उत्तरः

लज्जा से : अपनी पराजय के पश्चात् लज्जा से राजा द्रुपद का मस्तक झुका रह गया।

चारों ओर : गुरुकुल के चारों ओर का वातावरण अत्यंत शांत और पवित्र था।

मित्रता की मर्यादा : बिना किसी अभिमान और भेद-भाव के ही मित्रता की मर्यादा का पालन किया जा सकता है।

कोलाहल से : गुरुजी का आश्रम नगर के कोलाहल से बहुत दूर एकांत में स्थित था।

वैभव की चकाचौंध : राजमहल के वैभव की चकाचौंध के कारण राजकुमार द्रुपद के मन में अहंकार भर गया था।

9. वाक्य का निर्माण शब्दों के समूह से होता है। वाक्य रचना के कुछ नियम याद रखो :

i) वाक्य में कर्ता (उद्देश्य) को सबसे पहले लिखना चाहिए।

ii) यदि वाक्य में दो कर्म मौजूद हों, तो गौण कर्म को पहले और मुख्य कर्म को उसके बाद स्थान देना चाहिए।

iii) आमतौर पर विशेषण को विशेष्य से पहले और क्रिया-विशेषण को क्रिया से ठीक पहले रखा जाता है।

iv) ‘तो’, ‘भी’, ‘ही’, ‘तक’ जैसे अव्यय (निपात) उन शब्दों के ठीक बाद लगाए जाते हैं, जिन पर विशेष बल देना होता है।

जैसे-

आप तो कुछ समझते ही नहीं।

मैं भी चौराहे तक जाऊँगा।

v) नकारात्मक (निषेधात्मक) अव्यय हमेशा क्रिया से पहले प्रयोग किए जाते हैं।

जैसे-

राजू नहीं पढ़ेगा।

वे कभी नहीं हँसेंगे।

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Note – If you find any mistakes in this chapter, please let us know or correct them yourself while reading. Thank you!
সপ্তম শ্ৰেণী হিন্দী অধ্যায় ১১ (प्रतिशोध) – সঘনাই সোধা প্ৰশ্ন (FAQs)
সপ্তম শ্ৰেণীৰ হিন্দীৰ একাদশ অধ্যায়টোৰ নাম কি?
সপ্তম শ্ৰেণীৰ হিন্দীৰ একাদশ অধ্যায়টোৰ নাম হ’ল ‘प्रतिशोध’। ইয়াত মানৱীয় প্ৰমূল্যবোধ আৰু ক্ষমাৰ মহত্বৰ বিষয়ে আলোচনা কৰা হৈছে।
এই পাঠ্যভিত্তিক সমাধানত (Textual Solutions) কি কি অন্তৰ্ভুক্ত আছে?
ইয়াত মূল পাঠ্যপুথিৰ অনুশীলনীৰ সকলো প্ৰশ্নোত্তৰ, ব্যাকৰণ, পৰীক্ষাৰ বাবে প্ৰয়োজনীয় অতিৰিক্ত প্ৰশ্ন আৰু বহু-বিকল্পী প্ৰশ্ন (MCQs) অন্তৰ্ভুক্ত কৰা হৈছে।
এই সমাধানসমূহ AJB ৰ নতুন পাঠ্যক্ৰমৰ আধাৰত প্ৰস্তুত কৰা হৈছেনে?
হয়, এই সকলোবোৰ সমল অসম জাতীয় বিদ্যালয়ৰ (AJB) শেহতীয়া নতুন পাঠ্যক্ৰম আৰু নিৰ্দেশনা অনুসৰি প্ৰস্তুত কৰা হৈছে।
পৰীক্ষাৰ বাবে অতিৰিক্ত প্ৰশ্ন আৰু MCQs পঢ়াটো প্ৰয়োজনীয়নে?
হয়, পাঠটোৰ ওপৰত স্পষ্ট ধাৰণা ল’বলৈ আৰু পৰীক্ষাত সৰ্বোচ্চ নম্বৰ লাভ কৰিবলৈ অনুশীলনীৰ লগতে অতিৰিক্ত প্ৰশ্ন আৰু MCQ সমাধান কৰাটো অতি প্ৰয়োজনীয়।

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